रमजान: सिर्फ रोज़ा नहीं, रूह की ‘रीसेट’ का महीना

आशीष शर्मा (ऋषि भारद्वाज)
आशीष शर्मा (ऋषि भारद्वाज)

रमजान (Ramadan) इस्लामी कैलेंडर का नौवां महीना है लेकिन इसे सिर्फ एक धार्मिक रस्म समझ लेना बड़ी भूल होगी। यह महीना असल में इंसान को ‘रीसेट’ करने का मौका देता है। जैसे मोबाइल की बैटरी खत्म हो जाए तो उसे चार्ज करना पड़ता है, वैसे ही इंसान की रूह भी दुनिया की दौड़ भाग में थक जाती है। रमजान वही चार्जिंग स्टेशन है।

आज के दौर में, जहां सेल्फी ज्यादा और सेल्फ अकाउंटेबिलिटी कम है, वहां रोज़ा हमें खुद से सवाल पूछना सिखाता है क्या मैं सिर्फ दिखावे का धार्मिक हूं, या वाकई संवेदनशील इंसान भी हूं?

रमजान का महत्व: इबादत से आगे, इंसानियत तक

सूरह अल-बक़रह 2:183
“ऐ ईमान वालों! तुम पर रोज़ा फर्ज़ किया गया है, जिस तरह तुमसे पहले लोगों पर किया गया था, ताकि तुम परहेज़गार बनो।”

यह आयत साफ बताती है कि रोज़े का मकसद भूखा रहना नहीं, बल्कि तक़वा यानी अल्लाह की मौजूदगी का एहसास दिल में जगाना है। आज जब नैतिकता ट्रेंडिंग टॉपिक नहीं रही, तब रमजान इंसान को अंदर से अनुशासित बनाता है।

सूरह अल-बक़रह 2:185
“रमजान वह महीना है जिसमें कुरआन उतारा गया, जो लोगों के लिए मार्गदर्शन है…”

रमजान सिर्फ भूख-प्यास का इम्तिहान नहीं, बल्कि कुरआन से दोबारा जुड़ने का वक्त है। आज हम हर समस्या का समाधान गूगल पर ढूंढते हैं, लेकिन आध्यात्मिक उलझनों का हल ‘Guidance Manual’ यानी कुरआन में है।

सूरह अल-क़द्र 97:3
“शब-ए-कद्र हजार महीनों से बेहतर है।”

यह सिर्फ एक रात नहीं, बल्कि अवसर है पिछली गलतियों को सुधारने और नई शुरुआत करने का। हम पूरी रात सोशल मीडिया स्क्रॉल कर सकते हैं, पर इबादत में 20 मिनट भारी लगते हैं।

सब्र

रोज़ा हमें सिखाता है कि भूख लगे तो भी संयम रखो। गुस्सा आए तो भी चुप रहो। आज जब लोग ट्रैफिक में हॉर्न से और ट्विटर पर शब्दों से लड़ते हैं, तब रोज़ा सब्र का असली टेस्ट है।

हमदर्दी

भूख का एहसास अमीर-गरीब का फर्क मिटा देता है। रमजान हमें याद दिलाता है कि समाज में सिर्फ ‘स्टेटस’ नहीं, ‘स्टेटस ऑफ ह्यूमैनिटी’ भी जरूरी है।

आत्म-शुद्धि

रोज़ा सिर्फ खाने से नहीं, बुरी नजर से, झूठ से, चुगली से और दिखावे से भी होता है। अगर रोज़ा रखकर भी इंसान दूसरों को तकलीफ दे, तो वह सिर्फ डाइटिंग कर रहा है इबादत नहीं।

सामाजिक और नैतिक प्रभाव

ज़कात और सदक़ा से आर्थिक संतुलन। मस्जिदों में इकट्ठा होकर सामुदायिक एकता। परिवार के साथ इफ्तार से रिश्तों की मजबूती। रमजान असल में समाज को ‘री-कैलिब्रेट’ करने का महीना है।

आज का इंसान ‘फास्ट लाइफ’ में जी रहा है। रमजान उसे ‘स्लो डाउन’ करना सिखाता है। आज की दुनिया में जहां कंटेंट वायरल होता है, वहां चरित्र नहीं रमजान कहता है “पहले इंसान बनो, फिर इन्फ्लुएंसर।”

भूख से ज्यादा नीयत की परीक्षा

रमजान हमें यह सिखाता है कि असली ताकत भूखे रहकर भी ईमानदार रहने में है। असली जीत दूसरों को हराने में नहीं, खुद पर काबू पाने में है। अगर रमजान के बाद भी हमारे व्यवहार में बदलाव नहीं आया, तो हमने सिर्फ कैलेंडर बदला है खुद को नहीं।

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